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1 मार्च, “शून्य भेदभाव दिवस”

समानता ही महानता है

शून्य भेदभाव दिवस संयुक्त राष्ट्र एड्स कार्यक्रम (यूएनएड्स) द्वारा मनाया जाता है। यह दिवस हर वर्ष 1 मार्च को मनाया जाता है। पहली बार यह दिन वर्ष 2014 में मनाया गया था। समाज में आय, लिंग, आयु, स्वास्थ्य स्थिति, व्यवसाय, दिव्यांगता, यौन उत्पीड़न, नशे का उपयोग, लैंगिक पहचान, वर्ग, जाति और धर्म के आधार पर होने वाले विभिन्न भेदभाव को समाप्त करने तथा जागरूकता लाने के लिए शून्य भेदभाव दिवस महत्वपूर्ण माना जाता है।

ज़ीरो डिस्क्रिमिनेशन डे का उद्देश्य उम्र, लिंग, लैंगिकता, राष्ट्रीयता, नस्ल और रंग को ध्यान में रखे बिना सभी के अधिकारों को बढ़ावा देना है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और युवतियों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में समान अवसर दिलाना तथा उन्हें गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए आवाज़ उठाना है।

आज भारत को आज़ादी मिले 75 वर्ष से अधिक समय हो गया है, फिर भी विभिन्न प्रकार के भेदभाव समाज में देखने को मिलते हैं। भारत विविध जातियों, समुदायों और धर्मों का देश है। सभी की अपनी संस्कृति है, पहनावा अलग है और खान-पान भी अलग-अलग है। भारत को “विविधता में एकता” के सूत्र से बांधा गया है, लेकिन यह एकता दिल से कितनी है, यह सोचने का विषय है। क्या लोग वास्तव में सभी को समान मानते हैं? आखिर सभी इंसान ही हैं और इंसानियत का धर्म सभी धर्मों से बड़ा है, लेकिन इसे समझने और अपनाने वाला वर्ग अभी भी कम है।

हालांकि भारत एक युवा देश है और नई पीढ़ी शिक्षित होने के साथ समानता की सोच भी अपना रही है। यह सकारात्मक बदलाव है, लेकिन कभी-कभी युवा जोश में होश खो बैठते हैं और विवादों में भी आगे आ जाते हैं। देश को एक सूत्र में बांधने के लिए जरूरी है कि हम एक-दूसरे को समझें और यह स्वीकार करें कि सबसे पहले हम सभी इंसान हैं।

समानता ही महानता है
– मितल खेताणी (मो. 98242 21999)

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