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पुस्तकों का अनमोल संसार: ज्ञान, संस्कृति और जीवन को दिशा देने वाला अटूट साधन

पुस्तक दो कवरों के बीच रखे पन्नों को पलटते-पलटते आत्मा के साथ होने वाला संवाद है। पुस्तक ज्ञान का भंडार है। प्रगति और एक अनोखी समझ का मस्तिष्क के साथ होने वाला संबंध ही पुस्तक है। ज़रा सोचिए कि पुस्तक के बिना दुनिया कैसी होती? किसी भी बात की कोई दिशा, दशा या प्रमाण ही नहीं होता!
ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमेशा पुस्तकों की आवश्यकता रही है।
दो वर्ष के बच्चे से लेकर वृद्ध व्यक्ति तक अपने जीवन में पुस्तकों का उपयोग करते ही हैं, चाहे वह किसी भी विषय की पुस्तक हो—इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।
यदि शास्त्रों की बात करें, तो अगर प्राचीन काल में पुस्तकें न लिखी गई होतीं, तो आज हम रामायण, महाभारत, शिव पुराण, भगवद्गीता जैसे ग्रंथों का दर्शन और उनमें निहित ज्ञान को समझकर उसका पालन नहीं कर पाते। इससे भी बढ़कर, हमारे प्राचीन वेदों के माध्यम से हम जीवन जीने की सही राह नहीं जान पाते।
वर्तमान समय में दुनिया भर में कई शोध बताते हैं कि हर गुजरते दिन के साथ लोगों की पढ़ने की क्षमता कम होती जा रही है। आज लोग पढ़ना बहुत कम या बिल्कुल भी पसंद नहीं करते। इसका कारण शायद इंटरनेट के माध्यम से मिलने वाली ऑडियो-विजुअल सामग्री हो सकता है।
डिजिटल मीडिया के आने से अखबारों की बिक्री में आई कमी इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। लेकिन दूसरी ओर, पूरी दुनिया में असंख्य पुस्तकालय मौजूद हैं, समय के साथ नए पुस्तकालय भी स्थापित हो रहे हैं, और एक
अनुमान के अनुसार दुनिया में प्रतिदिन 2700 से अधिक नई पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। अगर लोगों की पढ़ने की क्षमता घट रही है, तो रोज़ इतनी किताबें प्रकाशित होकर कहाँ जाती हैं? कौन उन्हें पढ़ता है? यदि पढ़ने की रुचि इतनी कम हो गई है, तो इतनी पुस्तकों को प्रकाशित करने की क्या आवश्यकता है? ये आंकड़े बताते हैं कि लोग आज भी पढ़ने में रुचि रखते हैं।
दुनिया भर के अनगिनत पुस्तकालय, ढेरों पुस्तकें, प्रसिद्ध लेखकों के साथ-साथ उभरते लेखकों द्वारा लिखी गई विभिन्न प्रकार की रचनाएँ—जैसे कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता, हास्य और आलोचना—आज भी विश्वभर के पुस्तक प्रेमियों द्वारा पढ़ी जा रही हैं।
मित्तल खेताणी
(मो. 9824221999)

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